उत्तर प्रदेशशिक्षा विभाग

सहारनपुर में शिक्षक आक्रोशित, स्थानांतरण–समायोजन में बड़े फर्जीवाड़े के आरोप

सहारनपुर जिले में शिक्षा परिषद के अधीन संचालित प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों में किए जा रहे स्थानांतरण – समायोजन को लेकर शिक्षकों में जबरदस्त आक्रोश व्याप्त है। शिक्षकों का आरोप है कि शिक्षक विहीन एवं एकल शिक्षक विद्यालयों के नाम पर किए जा रहे इस समायोजन में नियमों को दरकिनार किया जा रहा है।

शिक्षकों का कहना है कि जिले में कई ऐसे विद्यालय हैं, जिन्हें एक वर्ष या उससे अधिक समय पहले बंद कर दिया गया था। उस समय इन बंद विद्यालयों के शिक्षकों को अन्य ऐसे स्कूलों में समायोजित किया गया था, जहाँ वास्तव में शिक्षकों की आवश्यकता थी।
लेकिन अब चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया है कि उन्हीं बंद विद्यालयों को कागजों में पुनः दर्शाकर, पहले से समायोजित शिक्षकों का दोबारा स्थानांतरण किया जा रहा है।

यह स्थिति इस ओर इशारा करती है कि जो विद्यालय सालों पहले बंद हो चुके थे, वे विभागीय रिकॉर्ड में आज भी संचालित दिखाए जा रहे थे। सवाल यह है कि जब विद्यालय वास्तव में बंद थे, तो उन्हें अभिलेखों में बंद क्यों नहीं दर्शाया गया? इसके पीछे शिक्षा विभाग की क्या मंशा थी, यह गंभीर जांच का विषय है।

सबसे बड़ा सवाल – चयनात्मक कार्रवाई क्यों?

शिक्षकों ने यह भी आरोप लगाया है कि जिले में कई ऐसे विद्यालय मौजूद हैं, जहाँ
• छात्र संख्या बेहद कम है
• जबकि शिक्षकों की संख्या आवश्यकता से कहीं अधिक है

इसके बावजूद ऐसे विद्यालयों के शिक्षकों का स्थानांतरण नहीं किया गया।

शिक्षकों का सवाल है कि यदि उद्देश्य वास्तव में शिक्षक विहीन और एकल शिक्षक विद्यालयों को सुचारू करना है, तो फिर कम छात्र – अधिक शिक्षक वाले स्कूलों को समायोजन प्रक्रिया से बाहर क्यों रखा गया?

क्या स्थानांतरण नीति सभी पर समान रूप से लागू नहीं होती?
या फिर यह प्रक्रिया चुनिंदा शिक्षकों को निशाना बनाने के लिए अपनाई जा रही है?

शिक्षकों का कहना है कि इस पूरी प्रक्रिया से न केवल उन्हें मानसिक, पारिवारिक और आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

उच्चस्तरीय जांच की मांग

शिक्षकों ने मांग की है कि
• पूरे स्थानांतरण – समायोजन प्रकरण की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।
• वर्षों से बंद विद्यालयों को कागजों में संचालित दिखाने के दोषियों की जवाबदेही तय की जाए।
• कम छात्र संख्या और अधिक शिक्षक वाले विद्यालयों की भी समुचित समीक्षा कर समान नीति लागू की जाए।
• नियम विरुद्ध किए गए सभी स्थानांतरणों को तत्काल निरस्त किया जाए।

अब यह मामला केवल स्थानांतरण का नहीं रह गया है, बल्कि शिक्षा विभाग में बड़े स्तर पर अनियमितताओं और संभावित घोटाले की ओर इशारा कर रहा है, जिसकी स्वतंत्र जांच बेहद जरूरी हो गई है।

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